एक दिन, दो कुर्सियां विचार कर रहीं थी | पुराना “ वफादार “ या नया “ सरदार “ तकरार कर रही थी | “ निष्ठा “ और “ सौदेबाजी” में होड़ लगी थी | राजतंत्र की हालत देख लोकतंत्र की रूह कंपी थी “ कुलपति “ को “ कुलपिता “ का संदेशा आया था निष्ठा ने सौदेबाजी के समक्ष शीश झुकाया था | यह देख उसका भी मन झुंझलाया था | कुर्सी बेचारी क्या करती , उसकी भी मजबूरी थी !! बेमन ही सही उसने दी मंजूरी थी !!! चंद रुपयों की खातिर जनादेश को ठुकराया था !!!! क्या यहीं सुशासन ........... भारतवर्ष ने चाहा था ....................
सृजन तुलिका एक विविधात्मक ब्लॉग हैं | इस पर आप कई तरह की साहित्यिक रचनाएँ जैसे की कविताये, लेख , कहानियॉ, जीवनी इत्यादि पढ़ सकते हैं | इस ब्लॉग का उद्देश्य उम्दा साहित्य आप लोगो तक पहुँचाना हैं |
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Thursday, July 9, 2020
Kya yahi sushasan chaha tha.... क्या यही सुशासन चाहा था....
Sunday, June 28, 2020
Chalo Ak Bar Fir…… चलो एक बार फिर…….
बरसात की इस सुहानी शाम में, चलो एक बार फिर पुराने सफर पर चलते हैं | चलो एक बार फिर “शुरू” से शुरू करते हैं|| जहाँ न थी ,भविष्य की चिंता न अतीत की झुंझलाहट था तो बस, प्रेम प्रेम और बस प्रेम चलो एक बार फिर वर्तमान को जी लेते हैं | चलो एक बार फिर “शुरू” से शुरू करते हैं|| जहाँ न थी, कमाने की चिंता न गंवाने की परवाह था तो बस एक दूसरे का साथ, चलो एक बार फिर मैं और तुम को हम कर लेते हैं| चलो एक बार फिर “शुरू” से शुरू करते हैं|| वो बरसात जिसमें भीगकर हम हो गए थे, सदा के लिये एक चलो एक बार फिर उन लम्हों को जी लेते हैं| चलो एक बार फिर “शुरू” से शुरू करते हैं|| Barsat ki is suhani sham mein, Chalo ak bar fir Purane safar par chalet hein. Chalo ak bar fir “Shuru” se shuru karte hein. Jaha n thi, bhavishya ki chinta N atit ki jhunjhlahat Tha to bas, prem, prem aur bas prem Chalo ak bar fir Vartman ko ji lete hein. Chalo, ak bar fir “Shuru” se shuru karte hein. Jaha n thi kamane ki chinta N gawane ki parwah Tha to bas ak dusare ka sath, Chalo ak bar fir “ mein” aur “tum” ko “hum” kar lete hein. Chalo ak bar fir “Shuru” se shuru karte hein. Vo Barsat jisme bhigkar, Hum ho gaye the, sada ke liye ak Chalo ak bar fir Un lamho ko ji lete hein. Chalo ak bar Chalo ak bar fir “Shuru” se shuru karte hein.
Sunday, June 21, 2020
मातृत्व एक नारी का अभिमान
सदा ही चुप रहती हूँ मैं , मुख बंद कर सब कुछ सहती हूँ मैं पर आज चुप रहा न जायेगा अब और सहा न जायेगा क्योंकि बात मेरे मातृत्व की है जिस पर इतराती हूँ मैं, अपनी जान दांव पर लगाती हूँ मैं| एक नेता का बयान आया है मेरे मातृत्व पर लांछन लगाया हैं कुपोषण का जिम्मेदार मुझे ठहराया हैं कोई जाकर उन्हें बताये ___________ नारी तो अपनी खून की आखिरी बूँद से भी अपने बच्चे को सींचती हैं| मानवता तो तब शर्मसार होती हैं जब चंद भ्रष्टाचारियों के कारण ,गर्भस्थ शिशु के पोषण की वस्तुएँ बाजारों में बिकती हैं !!! आज चुप रह न पाऊंगी .......................... उन महाशय ही नहीं , सारी दुनिया को बताऊंगी खोल दूंगी, उन भ्रष्टाचारियों की पोल जिन्होंने पोषण बेचकर मेरे बच्चे को कुपोषित बनाया हैं......... ...... कुपोषित बनाया हैं। अरे............................... एक बात तो रह ही गयी अब बात उन चंद आधुनिक महिलाओं की जो अपने फिगर पर इतराती हैं शराब पीती हैं , जंक फ़ूड खाती हैं वो माँ बनती ही कहाँ हैं वो तो कोख उधार लेती हैं| तो माँ को कटघरे में खड़ा करने से पहले जरा जमीन पर आइए ____________ नेताजी!!! अपना सामान्य ज्ञान बढ़ाइये। sada hi chup rahti hu mein, mukh band rakh, sab kuch sahti hu mein, par aaj saha na jayega ab chup raha na jayega kyoki bat mere matratva ki hein jis par itrati hu mein apni jan dav par lagati hu mein. ak neta ka bayan aaya hein , mere matratva par lanchan lagaya hein, kuposhan ka jimmedar mujhe thahraya hein
Friday, June 19, 2020
Shaheed Ki Vyatha
आँखों में क्रोध की चिंगारी थीं
सीने में अगन भीं भारी थीं।
बाजुओ में खुमारी थी
कान्धे पर बन्दूक भी भारी थीं।
फिर भी तिरंगे में लिपटकर आया
एक माँ का लाल , एक पिता का ग़रुर ,
एक बहन का भाई, एक पत्नि का पति
और एक बच्चे का पिता
ये कैसी लाचारी थीं॥
“शुट”के ऑर्डर का ईंतजांर करते,
उसके कान थें!!
प्रतिज्ञा की रस्सी से , बन्धे
उसके हाथ थे!!
ऐसा एक बार नही,
बार – बार होता हैं;
क्यों नही जवानों को स्वयं की,
रक्षा का अधिकार होता हैं।
ये कैसी विवशता, कैसी लाचारी हैं!
जो बहादुरो कि बहादुरी पर भारी हैं॥
वे आते हैं, मारकर चले जाते हैं,
हम बाते ही करते रह जाते हैं|
पर क्या ये बाते,समझौते
एक परिवार को उसका
सदस्य लौटाते हैं.....................????????????
Aankho mein krodh ki chingari thi Sine mein agan bhi bhari thi. Bajuo mein khumari thi Kandhe par bandook bhi bhari thi. Fir bhi tirange mein lipatkar aaya Ak maa ka lal, ak pita ka garur, Ak bahan ka bhai , ak patni ka pati Or ak bachche ka pita Ye kesi lachari thi. “Shoot” ke order ka intejar karte Uske kan the. Pratigya ki rassi se bandhe uske haath the! Esa ak bar nahi, Bar- bar hota hein, Kyon nahi jawano ko swayam ki, Raksha ka adhikar hota hein. Ye kesi vivashata, kesi lachari hein Jo bahaduro ki bahaduri par bhari hein. Ve aate hein, markar chale jate hein, Hum bate hi karte rah jate hein. Par kya ye bate ,samjhote Ak pariwar ko uska Sadasya lautate hein...................................??????
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