बरसात की इस सुहानी शाम में, चलो एक बार फिर पुराने सफर पर चलते हैं | चलो एक बार फिर “शुरू” से शुरू करते हैं|| जहाँ न थी ,भविष्य की चिंता न अतीत की झुंझलाहट था तो बस, प्रेम प्रेम और बस प्रेम चलो एक बार फिर वर्तमान को जी लेते हैं | चलो एक बार फिर “शुरू” से शुरू करते हैं|| जहाँ न थी, कमाने की चिंता न गंवाने की परवाह था तो बस एक दूसरे का साथ, चलो एक बार फिर मैं और तुम को हम कर लेते हैं| चलो एक बार फिर “शुरू” से शुरू करते हैं|| वो बरसात जिसमें भीगकर हम हो गए थे, सदा के लिये एक चलो एक बार फिर उन लम्हों को जी लेते हैं| चलो एक बार फिर “शुरू” से शुरू करते हैं|| Barsat ki is suhani sham mein, Chalo ak bar fir Purane safar par chalet hein. Chalo ak bar fir “Shuru” se shuru karte hein. Jaha n thi, bhavishya ki chinta N atit ki jhunjhlahat Tha to bas, prem, prem aur bas prem Chalo ak bar fir Vartman ko ji lete hein. Chalo, ak bar fir “Shuru” se shuru karte hein. Jaha n thi kamane ki chinta N gawane ki parwah Tha to bas ak dusare ka sath, Chalo ak bar fir “ mein” aur “tum” ko “hum” kar lete hein. Chalo ak bar fir “Shuru” se shuru karte hein. Vo Barsat jisme bhigkar, Hum ho gaye the, sada ke liye ak Chalo ak bar fir Un lamho ko ji lete hein. Chalo ak bar Chalo ak bar fir “Shuru” se shuru karte hein.
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Sunday, June 28, 2020
Chalo Ak Bar Fir…… चलो एक बार फिर…….
Friday, June 19, 2020
Shaheed Ki Vyatha
आँखों में क्रोध की चिंगारी थीं
सीने में अगन भीं भारी थीं।
बाजुओ में खुमारी थी
कान्धे पर बन्दूक भी भारी थीं।
फिर भी तिरंगे में लिपटकर आया
एक माँ का लाल , एक पिता का ग़रुर ,
एक बहन का भाई, एक पत्नि का पति
और एक बच्चे का पिता
ये कैसी लाचारी थीं॥
“शुट”के ऑर्डर का ईंतजांर करते,
उसके कान थें!!
प्रतिज्ञा की रस्सी से , बन्धे
उसके हाथ थे!!
ऐसा एक बार नही,
बार – बार होता हैं;
क्यों नही जवानों को स्वयं की,
रक्षा का अधिकार होता हैं।
ये कैसी विवशता, कैसी लाचारी हैं!
जो बहादुरो कि बहादुरी पर भारी हैं॥
वे आते हैं, मारकर चले जाते हैं,
हम बाते ही करते रह जाते हैं|
पर क्या ये बाते,समझौते
एक परिवार को उसका
सदस्य लौटाते हैं.....................????????????
Aankho mein krodh ki chingari thi Sine mein agan bhi bhari thi. Bajuo mein khumari thi Kandhe par bandook bhi bhari thi. Fir bhi tirange mein lipatkar aaya Ak maa ka lal, ak pita ka garur, Ak bahan ka bhai , ak patni ka pati Or ak bachche ka pita Ye kesi lachari thi. “Shoot” ke order ka intejar karte Uske kan the. Pratigya ki rassi se bandhe uske haath the! Esa ak bar nahi, Bar- bar hota hein, Kyon nahi jawano ko swayam ki, Raksha ka adhikar hota hein. Ye kesi vivashata, kesi lachari hein Jo bahaduro ki bahaduri par bhari hein. Ve aate hein, markar chale jate hein, Hum bate hi karte rah jate hein. Par kya ye bate ,samjhote Ak pariwar ko uska Sadasya lautate hein...................................??????
Thursday, June 18, 2020
॥जिंदगी॥
न थी मैं पराये कीतुम्हारी अपनी हीं तो थी
फिर क्यूं खत्म कर दिया मुझें ?
माना कि थोड़ी सी मुश्किल हूँ मैं
पर इतनी भी नहीं !
कुछ अच्छा तो किया था मैंने
तुम्हारे साथ भी !!
फिर क्यूं खत्म कर दिया मुझें ?
वो प्रवासी मजदूर , भूखे – नंगे
हजारो कोस पैदल चलकर
सीने में जीवन कि आस लिये, सदैव संघर्षरत
जरा भीं प्रेरित न कर पाए तुम्हें ?
पिता का प्यार , बहनों की ममता
जरा भी विचलित न कर पाई तुम्हें ?
तो शायद तुम्हारा जाना हीं ठीक था !!!
मगर इस तरह रहस्य बनाकर
क्यूं खत्म कर दिया मुझें ?
आखिर क्यूं..., क्यूं..., क्यूं...........................????
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