एक दिन, दो कुर्सियां विचार कर रहीं थी | पुराना “ वफादार “ या नया “ सरदार “ तकरार कर रही थी | “ निष्ठा “ और “ सौदेबाजी” में होड़ लगी थी | राजतंत्र की हालत देख लोकतंत्र की रूह कंपी थी “ कुलपति “ को “ कुलपिता “ का संदेशा आया था निष्ठा ने सौदेबाजी के समक्ष शीश झुकाया था | यह देख उसका भी मन झुंझलाया था | कुर्सी बेचारी क्या करती , उसकी भी मजबूरी थी !! बेमन ही सही उसने दी मंजूरी थी !!! चंद रुपयों की खातिर जनादेश को ठुकराया था !!!! क्या यहीं सुशासन ........... भारतवर्ष ने चाहा था ....................
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Thursday, July 9, 2020
Kya yahi sushasan chaha tha.... क्या यही सुशासन चाहा था....
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Nice
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