न थी मैं पराये कीतुम्हारी अपनी हीं तो थी
फिर क्यूं खत्म कर दिया मुझें ?
माना कि थोड़ी सी मुश्किल हूँ मैं
पर इतनी भी नहीं !
कुछ अच्छा तो किया था मैंने
तुम्हारे साथ भी !!
फिर क्यूं खत्म कर दिया मुझें ?
वो प्रवासी मजदूर , भूखे – नंगे
हजारो कोस पैदल चलकर
सीने में जीवन कि आस लिये, सदैव संघर्षरत
जरा भीं प्रेरित न कर पाए तुम्हें ?
पिता का प्यार , बहनों की ममता
जरा भी विचलित न कर पाई तुम्हें ?
तो शायद तुम्हारा जाना हीं ठीक था !!!
मगर इस तरह रहस्य बनाकर
क्यूं खत्म कर दिया मुझें ?
आखिर क्यूं..., क्यूं..., क्यूं...........................????
सृजन तुलिका एक विविधात्मक ब्लॉग हैं | इस पर आप कई तरह की साहित्यिक रचनाएँ जैसे की कविताये, लेख , कहानियॉ, जीवनी इत्यादि पढ़ सकते हैं | इस ब्लॉग का उद्देश्य उम्दा साहित्य आप लोगो तक पहुँचाना हैं |
Thursday, June 18, 2020
॥जिंदगी॥
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Very nice
ReplyDeleteBahut sundar
ReplyDeleteShandar, jabarjast
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