ये महामारी, हमेशा गरीबो पर ही क्यों भारी होती हैं, क्या प्रकृति के न्याय मैं भी,पैसो की शुमारी होती हैं | गर ऐसा हैं तो, फिर क्यों कहते हैं की पैसो की तो सिर्फ, इस दुनिया में खुमारी होती हैं || Ye mahamari, hamesha garibo par hi kyo bhari hoti hein, kya prakriti ke nyay mein bhi paiso ki shumari hoti hein. gar esa hein to, fir kyo kahte hein ki paiso ki to sirf, is duniya mein khumari hoti hein दान तो, बहुतो की झोली से निकला हैं, मगर क्या,जरुरतमंदों की ड्योढ़ी तक पहुँचा हैं | गर पहुँचा हैं,तो किस गृह के हैं वो लोग, जिनके घरों से,भूखों का जनाज़ा निकला हैं || dan to, bahuto ki jholi se nikla hein, magar kya, jaruratmando ki dyodi taq pahucha hein, gar pahucha hein, to kon hein vo log, jinke gharo se, bhukho ka janaja nikla hein.
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Wednesday, June 24, 2020
चार - चार पंक्तियाँ
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